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चीन और मालदीव ने नए समझौते पर किया हस्ताक्षर, भारत के साथ तनावपूर्ण संबंधों के बीच समझौता

March 5, 2024 Simran Khan 1 min read
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नई दिल्ली: हिंद महासागर क्षेत्र में बदलती गतिशीलता के बीच, मालदीव और चीन ने दो सैन्य समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. ये सौदे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में एक नया अध्याय जोड़ते हैं, खासकर ऐसे समय में जब मालदीव की भारत के साथ बातचीत में तनाव के संकेत दिख रहे हैं.

समझौतों को एक समारोह में औपचारिक रूप दिया गया जहां मालदीव के रक्षा मंत्री घासन मौमून और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के अंतर्राष्ट्रीय सैन्य सहयोग कार्यालय के उप निदेशक मेजर जनरल झांग बाओकुन ने दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया है.

क्या है समझोता

मालदीव मीडिया के अनुसार, एक समझौते की शर्तों के तहत, चीन ने मालदीव को बिना किसी कीमत के सैन्य सहायता प्रदान करने का वादा किया है. हालांकि सहायता की बारीकियों का खुलासा नहीं किया गया है, लेकिन चीन की ओर से यह इशारा दोनों देशों के बीच सैन्य और रणनीतिक संबंधों को गहरा करने का संकेत देता है. मालदीव के रक्षा मंत्रालय ने अभी तक सहायता के विवरण का खुलासा नहीं किया है, जिससे सैन्य समर्थन की प्रकृति और दायरे पर अटकलों की गुंजाइश बनी हुई है.

इसी के साथ सारी अपको बता दें, चीनी अनुसंधान पोत जियांग यांग होंग 3 के संबंध में एक समानांतर समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसने हाल ही में मालदीव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जैसा कि मालदीव मीडिया ने उद्धृत किया है. यह समझौता संभावित रूप से हिंद महासागर क्षेत्र आईओआर में समुद्री अनुसंधान को प्रभावित कर सकता है, जिससे उनके द्विपक्षीय संबंध और मजबूत होंगे. ये समझौते ऐसे नाजुक मोड़ पर आए हैं जब मालदीव के भारत के साथ रिश्ते ठंडे पड़ते दिख रहे हैं. मुइज़ू सरकार की चीन के साथ बढ़ती संलग्नता एक रणनीतिक धुरी का संकेत देती है, जो संभवतः क्षेत्र में शक्ति और प्रभाव के संतुलन को पुनः व्यवस्थित कर रही है. हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित मालदीव इस क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और व्यापार मार्गों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

चीन और मालदीव के बीच नये सैन्य समझौते महज़ दस्तावेज़ों से कहीं अधिक हैं. वे हिंद महासागर में विकसित हो रहे भू-राजनीतिक परिदृश्य के प्रमाण हैं. जैसे-जैसे मालदीव चीन के साथ अपने सैन्य और रणनीतिक संबंधों को मजबूत कर रहा है, इस साझेदारी के प्रभाव दोनों देशों के तटों से कहीं दूर तक महसूस किए जाने की संभावना है, जो आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय शक्ति की गतिशीलता को आकार देगा.

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