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Health

हो जाए सावधान।मां के पेट में पल रहे बच्चो पर भी हो रहा कोरोना का असर!!

April 9, 2023 Megha Jain 1 min read
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कोरोनावायरस का खतरा अब तक तो खुली हवा में घूम रहे लोगो पर था पर अब कोरोना का खतरा अब मां के पेट में पल रहे शिशुओं तक पहुंच चुका है और  तक मां के प्लेसेंटा के मस्तिष्क में वायरस का अटैक पाया गया है. कोरोना पॉजिटिव दो मांओं के दो बच्चों का ब्रेन डैमेज हो चुका है. 

अमेरिका के मियामी विश्वविद्यालय में एक रिसर्च से सामने आया है कि कम से कम 2 मामलों में कोविड वायरस गर्भवती माताओं की नाल को पार करके बच्चों के ब्रेन को डैमेज करने में सफल रहा है. रिसर्च टीम का मानना है कि ये मामले दुर्लभ थे. मगर जो महिलाएं गर्भावस्था के दौरान कोरोना संक्रमित हुई थीं, उनसे आग्रह किया गया कि वे अपने बच्चों को बाल रोग विशेषज्ञों के पास जरूर लेकर जाएं. जिससे बच्चों में विकास संबंधी किसी भी देरी की जांच करके सही कारण का पता लगाया जा सके. रिसर्च टीम ने कहा कि कई मामलों में इस तरह के लक्षण सात या आठ साल की उम्र तक या जब तक कि बच्चे स्कूल नहीं जाते, सामने नहीं आते हैं. रिसर्च टीम ने गर्भावस्था पर विचार कर रही सभी महिलाओं से कोविड-19 का टीका लगवाने की अपील की.

पहले दो पुष्ट मामले सामने आऐ, जिनमें कोविड वायरस ने गर्भ में शिशुओं का ब्रेन डैमेज किया.

डॉक्टरों को पहले से ही संदेह था कि ऐसा होना संभव है.

अब तक मां के प्लेसेंटा या शिशु के ब्रेन में कोविड-19 का कोई सबूत नहीं मिला था.

साइटोमेगालोवायरस, रूबेला, एचआईवी और जीका सहित कई वायरस माता के प्लेसेंटा को पार करने और भ्रूण के ब्रेन को नुकसान पहुंचाने में सक्षम माने जाते हैं. कोविड-19 वायरस भी वयस्कों के दिमाग के ऊतकों में पाया गया है. कुछ एक्सपर्ट्स को पहले ही संदेह था कि यह भ्रूण के दिमाग के ऊतकों को भी नुकसान पहुंचा सकता है. मगर इसका कोई ठोस सबूत अब तक नहीं पाया गया था. मियामी विश्वविद्यालय में प्रसूति एवं स्त्री रोग के अध्यक्ष डॉ. माइकल पेडास ने कहा कि यह पहली बार है जब हम ट्रांसप्लासेंटल के रास्ते से भ्रूण के अंग में पहुंचे कोविड वायरस के सबूत को सामने लाने में सक्षम हुए हैं. इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है.

जिन नवजात शिशुओं के ब्रेन को कोविड वायरस ने डैमेज किया था, उनको जीवन के पहले दिन से दौरे पड़ते थे. हालांकि जीका वायरस के होने वाले असर के विपरीत ये बच्चे माइक्रोसेफली के साथ पैदा नहीं हुए थे. माइक्रोसेफली एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें बच्चों के सिर छोटे आकार के होते हैं. रिसर्च टीम ने कहा कि इसके बजाय इन बच्चों में माइक्रोसेफली समय के साथ डेवलप हुई, क्योंकि उनके दिमाग ने सामान्य दर से बढ़ना बंद कर दिया. दोनों बच्चों में विकास संबंधी गंभीर देरी देखी गई थी. रिसर्च टीम ने कहा कि बच्चों में से एक की 13 महीने की उम्र में मौत हो गई और दूसरा अस्पताल में है. इन बच्चों की एक की माता में केवल हल्के लक्षण थे और बच्चे का जन्म गर्भ का समय पूरा होने पर हुआ. जबकि दूसरी मां इतनी बीमार थी कि डॉक्टरों को 32 हफ्ते के गर्भ में ही बच्चे को जन्म देना पड़ा.

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